गत वर्षों में मैंने पाया कि बहुत से ऐसे बुद्धिजीवी हैं जिनकी सोच का पैनापन सचमुच सराहनीय है । किंतु परिस्थिति कहें या मानव स्वभाव कि वे लिखने से हिचकते हैं । फलस्वरूप उनके उज्जवल विचार समाज के सामने आने से रह जाते हैं । यह ब्लॉग ऐसे ही बुद्धिजीवियों को इकट्ठा करने का एक मंच है ।

Thursday, 25 October 2007

तुकबन्दी2

नहीं रुका वो पल जिसको रोकना चाहा
पकड कर श्वास जो जीवन को रोकना चाहा
हुई जब रात तो मुडकर भी देखना चाहा
सोचा कि थाम लूँ बहती इस नदी का जल
रोक लूँ हाथ में रेत, रात ये श्यामल
बढाया हाथ ज्यों मैने तो समझ मुझको आया
यह भी बीत जाएगा...

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तुकबन्दी1

इक रोज़ दौर-ए-ग़म मे
वो बह चला आँखों से मेरी
मैंने कहा तूँ थम ज़रा
यह नहीं मञ्ज़िल तेरी


गर रहा तय यूँ दौर-ए-ग़म
गिरना तुझे क्यों कुबूल था
बनकर चमकना आँखों में खुशी
क्यों लग रहा फ़िज़ूल सा


हम 'मुसाफिर' दिल की राहों के
लेते हैं ग़म, देते नहीं
अपनाया हमें या ठुकरा दिया
नीर आँखों से बहता नहीं